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Wednesday, 1st April, 2026
चरगांवा
रूरल न्यूज नेटवर्क। एम्स गोरखपुर
ने नवजातों और स्कूली छात्रों के कानों की स्क्रीनिंग करने का निर्णय लिया है। यह
फैसला बच्चों में जन्मजात कारणों, संक्रमण या अनुपचारित कान की स्थितियों के कारण होने वाली
स्पीच, भाषा और सीखने
की समस्याओं को देखते हुए लिया गया है। एम्स का मानना है कि समय पर जांच और इलाज
से इस समस्या को रोका जा सकता है।
गोरखपुर एम्स
के नाक, कान, गला रोग
विशेषज्ञों की जांच में सामने आया है कि बच्चों में श्रवण हानि (हियरिंग लॉस) की
समस्या वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है। यह बच्चों की सुनने की क्षमता, बोलने, भाषा विकास और
याददाश्त को प्रभावित करती है, जिससे उनके सामाजिक विकास में बाधा आती है। एम्स की नाक,
कान, गला रोग
विशेषज्ञ डॉ. पंखुड़ी मित्तल ने बताया कि नवजातों में यह दिक्कत जन्मजात हो सकती
है। इसके अतिरिक्त, संक्रमण और अनुपचारित कान की स्थितियाँ भी बच्चों
में श्रवण हानि का कारण बन रही हैं।
डॉ. मित्तल ने
जोर दिया कि यदि बीमारी की पहचान और इलाज समय पर शुरू हो जाए, तो बच्चों की
सुनने की क्षमता को बचाया जा सकता है। एम्स की कार्यकारी निदेशक सेवानिवृत्त मेजर
जनरल डॉ. विभा दत्ता ने बताया कि इस बीमारी की गंभीरता को देखते हुए ईएनटी विभाग
ने जागरूकता बढ़ाने का निर्णय लिया है।
इस पहल के तहत नवजातों सहित स्कूली बच्चों के कानों की स्क्रीनिंग की जाएगी, जिसमें स्कूल-आधारित स्क्रीनिंग प्रमुख है। एम्स सही समय पर श्रवण संबंधी कठिनाइयों की पहचान कर उनका इलाज भी करेगा। डॉ. दत्ता ने बताया कि एम्स इस वर्ष की थीम 'फ्रॉम कम्युनिटीज टू क्लासरूम्स: हियरिंग केयर फॉर ऑल' के अनुरूप काम करेगा, जिसका उद्देश्य सुनने की अक्षमता और श्रवण यंत्रों से जुड़े झिझक को दूर कर बच्चों को सीखने और आगे बढ़ने में मदद करना है।